श्री धन्वंतरि जी की आरती
Shree Dhanvantari Aarti • 1 पावन पद
"जय धन्वन्तरि देवा, जय जय धन्वन्तरि देवा"
आयुर्वेद के जनक, समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए भगवान धन्वंतरि जी की आरोग्य प्रदायिनी आरती।
जय धन्वन्तरि देवा, जय जय धन्वन्तरि देवा। सकल रोग हरता तुम, अमृतमय सेवा॥ चार भुजा धारे प्रभु, शङ्ख चक्र धारी। अमृत कलश कर सोहे, आयुर्वेद प्रचारी॥ काटो सब भव-रोगा, देहु निरोगी काया। आरती जो नर गावे, मिटे मोह अरु माया॥ सदा स्वस्थ तन-मन रहे, कृपा करो जगदीशा। जय धन्वन्तरि देवा, प्रणवत है विश्वा॥
Jaya Dhanvantarī Dēvā, Jaya Jaya Dhanvantarī Dēvā. Sakala rōga haratā tuma, amr̥tamaya sēvā.. Chāra bhujā dhārē prabhu, shaṅkha chakra dhārī.. Sadā svastha tana-mana rahē, kr̥pā karō Jagadīshā..
अमृत कलश धारण करने वाले, समस्त व्याधियों के नाशक भगवान धन्वंतरि की आरती से मनुष्य निरोगी काया और दीर्घायु पाता है।
Bearer of the nectar pot and master of healing, whose Aarti grants wholesome health, vitality, and longevity.
धनतेरस (धन्वंतरि जयंती) अथवा नित्य प्रातः औषध सेवन से पूर्व भक्तिभाव से आरती करें।
असाध्य रोगों का शमन, उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, शारीरिक बल एवं मानसिक ऊर्जा की प्राप्ति।
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