अनुराधा जी, यह प्रश्न सनातन धर्म के समन्वयवादी दृष्टिकोण को समझने की कुंजी है।
१. अरूप से रूप की यात्रा:
ईश्वर सर्वव्यापी और निराकार है—जैसे वायु सर्वत्र है, परंतु उसका अनुभव करने के लिए हमें पंखा चाहिए; जैसे दूध में मक्खन सर्वत्र व्याप्त है, परंतु उसे निकालने के लिए मंथन की प्रक्रिया चाहिए। इसी प्रकार विग्रह (मूर्ति) निराकार परब्रह्म का साकार प्रतीक (Symbolic Manifestation) है।
२. चित्त की एकाग्रता (Alambana):
पतंजलि योगसूत्र और वेदान्त दोनों स्वीकार करते हैं कि साधारण मानव मन अमूर्त (Abstract) पर तुरंत एकाग्र नहीं हो सकता। जब मन को एक आलम्बन (Form/Image) दिया जाता है, जिसमें तेज, करुणा, ज्ञान और पवित्रता के भाव हों, तो चित्त की वृत्तियाँ शांत होती हैं।
३. प्राण-प्रतिष्ठा का रहस्य:
सनातन धर्म में केवल पाषाण या धातु की पूजा नहीं होती। जब तक वैदिक मंत्रों द्वारा उसमें 'प्राण-प्रतिष्ठा' नहीं होती, वह केवल एक कलाकृति है। प्राण-प्रतिष्ठा के बाद वह विग्रह साधक के लिए साक्षात् ईश्वरीय ऊर्जा का केंद्र बन जाता है।
श्रीमद्भागवत में भगवान कहते हैं:
"मनो-मय्यात्म-रूपेण मन्मयीं मूर्तिमुद्वहन्।"
विग्रह के माध्यम से साधक धीरे-धीरे स्थूल से सूक्ष्म और अंततः सर्वव्यापक चैतन्य की ओर अग्रसर होता है।
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