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ईशावास्योपनिषद् (ईशोपनिषद्) • अध्याय 1, मन्त्र 5

Ishavasya Upanishad (Isha) • शुक्ल यजुर्वेद (Shukla Yajurveda)

ईशावास्योपनिषद् (ईशोपनिषद्) • अध्याय 1 • मन्त्र 5

Ishavasya Upanishad (Isha) 1.5

Mantra: 1.5 [Ishopanishad_1.5]

तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥ ५॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

फिर वह कैसा है.

वह ब्रह्म गति वाला है अर्थात् प्रत्येक पदार्थ को गति देता हैं परन्तु स्वयं गति शून्य है, वह दूर भी है और समीप भी है। वह इस सारे संसार के अन्दर है और वही इस के बाहर है । जिस तरह चुम्बक पत्थर स्वयं गति न करता हुआ भी लोहे को गति दे देता है इसी प्रकार ब्रह्म में स्वयं गति नहीं है फिर भी सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों को वही गति प्रदान करता है और आत्मा में व्यापक होने से वह बहुत ही समीप है तथापि आँख में पड़े काजल के समान वह दिखाई नहीं देता। जिस तरह दिया सलाई की अग्नि बिना घिसे प्रकट नहीं होती इसी तरह ब्रह्म भी बिना योगाभ्यास के प्राप्त नहीं होता। ॥५॥