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Ishavasya Upanishad (Isha) 1.4
अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत् । तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४॥
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
जो ब्रह्म एक अर्थात अद्वितीय और अचल एक रस है, वह मन से भी अधिक वेग वाला है। वह सब जगह पहले से ही व्याप्त है। उस ब्रह्म तक इन्द्रियां नहीं पहुँचतीं, अर्थात् इन्द्रियों का विषय न होने के कारण इन्द्रियाँ उसको नहीं जान सकतीं। वह ब्रह्म स्वयं ठहरा हुआ भी है तो भी दौड़ते हुए अन्य सब पदार्थों को उल्लङ्घन कर जाता है (क्योंकि दौड़ने वाले हर पदार्थ से पूर्व ही वह हर स्थान पर विद्यमान रहता है) उसी के भीतर वायु मेघादि रूप में जलों को धारण करता है। ॥४॥