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ईशावास्योपनिषद् (ईशोपनिषद्) • अध्याय 1, मन्त्र 14

Ishavasya Upanishad (Isha) • शुक्ल यजुर्वेद (Shukla Yajurveda)

ईशावास्योपनिषद् (ईशोपनिषद्) • अध्याय 1 • मन्त्र 14

Ishavasya Upanishad (Isha) 1.14

Mantra: 1.14 [Ishopanishad_1.14]

सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयँ सह । विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भृत्याऽमृतमश्नुते ॥ १४॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो मनुष्य कार्य रूप प्रकृति और विनाश अर्थात् कारण रूप प्रकृति इन दोनों को साथ साथ जानता है वह (विनाश) कारणात्मक प्रकृति के ज्ञान से मृत्यु को पार कर कार्य शरीर से ही अमृत पद को प्राप्त होता है इसका आशय यह है कि प्राकृतिक तत्व ज्ञान के बिना आत्मा और ईश्वर का विवेक नहीं हो सकता, इसलिये जब मनुष्य प्रकृति की वास्तविकता को जान लेता है तब जन्म मरण के बन्धन से छूट कर इस शरीर से ही जीवन मुक्त दशा को प्राप्त करके ब्रह्मानन्द को प्राप्त कर लेता है। ॥१४॥