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माँ जानकी सीता जी

श्री सीता चालीसा

Shree Sita Chalisa • रचयिता: परम्परागत

जनकनन्दिनी, पतिव्रत धर्म की साक्षात् प्रतिमा माँ सीता जी की विनम्र स्तुति, जो धैर्य, त्याग और पातिव्रत्य शक्ति का संचार करती है।

मन की शांति, सहनशीलता, पति-पत्नी में प्रगाढ़ प्रेम और संकट काल में संबल की प्राप्ति।
6 दोहे
40 चौपाइयाँ
दोहा प्रारंभिक दोहा 1

सीता चालीसा सीता चालीसा ॥ दोहा ॥

दोहा प्रारंभिक दोहा 2

बन्दौ चरण सरोज निज जनक लली सुख धाम, राम प्रिय किरपा करें सुमिरौं आठों धाम ॥

चौपाई चौपाई 1

कीरति गाथा जो पढ़ें सुधरैं सगरे काम, मन मन्दिर बासा करें दुःख भंजन सिया राम ॥

चौपाई चौपाई 2

॥ चौपाई ॥

चौपाई चौपाई 3

राम प्रिया रघुपति रघुराई बैदेही की कीरत गाई ॥

चौपाई चौपाई 4

चरण कमल बन्दों सिर नाई, सिय सुरसरि सब पाप नसाई ॥

चौपाई चौपाई 5

जनक दुलारी राघव प्यारी, भरत लखन शत्रुहन वारी ॥

चौपाई चौपाई 6

दिव्या धरा सों उपजी सीता, मिथिलेश्वर भयो नेह अतीता ॥

चौपाई चौपाई 7

सिया रूप भायो मनवा अति, रच्यो स्वयंवर जनक महीपति ॥

चौपाई चौपाई 8

भारी शिव धनु खींचै जोई, सिय जयमाल साजिहैं सोई ॥

चौपाई चौपाई 9

भूपति नरपति रावण संगा, नाहिं करि सके शिव धनु भंगा ॥

चौपाई चौपाई 10

जनक निराश भए लखि कारन , जनम्यो नाहिं अवनिमोहि तारन ॥

चौपाई चौपाई 11

यह सुन विश्वामित्र मुस्काए, राम लखन मुनि सीस नवाए ॥

चौपाई चौपाई 12

आज्ञा पाई उठे रघुराई, इष्ट देव गुरु हियहिं मनाई ॥

चौपाई चौपाई 13

जनक सुता गौरी सिर नावा, राम रूप उनके हिय भावा ॥

चौपाई चौपाई 14

मारत पलक राम कर धनु लै, खंड खंड करि पटकिन भू पै ॥

चौपाई चौपाई 15

जय जयकार हुई अति भारी, आनन्दित भए सबैं नर नारी ॥

चौपाई चौपाई 16

सिय चली जयमाल सम्हाले, मुदित होय ग्रीवा में डाले ॥

चौपाई चौपाई 17

मंगल बाज बजे चहुँ ओरा, परे राम संग सिया के फेरा ॥

चौपाई चौपाई 18

लौटी बारात अवधपुर आई, तीनों मातु करैं नोराई ॥

चौपाई चौपाई 19

कैकेई कनक भवन सिय दीन्हा, मातु सुमित्रा गोदहि लीन्हा ॥

चौपाई चौपाई 20

कौशल्या सूत भेंट दियो सिय, हरख अपार हुए सीता हिय ॥

चौपाई चौपाई 21

सब विधि बांटी बधाई, राजतिलक कई युक्ति सुनाई ॥

चौपाई चौपाई 22

मंद मती मंथरा अडाइन, राम न भरत राजपद पाइन ॥

चौपाई चौपाई 23

कैकेई कोप भवन मा गइली, वचन पति सों अपनेई गहिली ॥

चौपाई चौपाई 24

चौदह बरस कोप बनवासा, भरत राजपद देहि दिलासा ॥

चौपाई चौपाई 25

आज्ञा मानि चले रघुराई, संग जानकी लक्षमन भाई ॥

चौपाई चौपाई 26

सिय श्री राम पथ पथ भटकैं , मृग मारीचि देखि मन अटकै ॥

चौपाई चौपाई 27

राम गए माया मृग मारन, रावण साधु बन्यो सिय कारन ॥

चौपाई चौपाई 28

भिक्षा कै मिस लै सिय भाग्यो, लंका जाई डरावन लाग्यो ॥

चौपाई चौपाई 29

राम वियोग सों सिय अकुलानी, रावण सों कही कर्कश बानी ॥

चौपाई चौपाई 30

हनुमान प्रभु लाए अंगूठी, सिय चूड़ामणि दिहिन अनूठी ॥

चौपाई चौपाई 31

अष्ठसिद्धि नवनिधि वर पावा, महावीर सिय शीश नवावा ॥

चौपाई चौपाई 32

सेतु बाँधी प्रभु लंका जीती, भक्त विभीषण सों करि प्रीती ॥

चौपाई चौपाई 33

चढ़ि विमान सिय रघुपति आए, भरत भ्रात प्रभु चरण सुहाए ॥

चौपाई चौपाई 34

अवध नरेश पाई राघव से, सिय महारानी देखि हिय हुलसे ॥

चौपाई चौपाई 35

रजक बोल सुनी सिय बन भेजी, लखनलाल प्रभु बात सहेजी ॥

चौपाई चौपाई 36

बाल्मीक मुनि आश्रय दीन्यो, लवकुश जन्म वहाँ पै लीन्हो ॥

चौपाई चौपाई 37

विविध भाँती गुण शिक्षा दीन्हीं, दोनुह रामचरित रट लीन्ही ॥

चौपाई चौपाई 38

लरिकल कै सुनि सुमधुर बानी,रामसिया सुत दुई पहिचानी ॥

चौपाई चौपाई 39

भूलमानि सिय वापस लाए, राम जानकी सबहि सुहाए ॥

चौपाई चौपाई 40

सती प्रमाणिकता केहि कारन, बसुंधरा सिय के हिय धारन ॥

दोहा समापन दोहा 1

अवनि सुता अवनी मां सोई, राम जानकी यही विधि खोई ॥

दोहा समापन दोहा 2

पतिव्रता मर्यादित माता, सीता सती नवावों माथा ॥

दोहा समापन दोहा 3

॥ दोहा ॥

दोहा समापन दोहा 4

जनकसुत अवनिधिया राम प्रिया लवमात, चरणकमल जेहि उन बसै सीता सुमिरै प्रात ॥