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भगवान शनिदेव (कर्मफलदाता)

श्री शनि चालीसा

Shree Shani Chalisa • रचयिता: परम्परागत

सूर्यपुत्र, न्यायप्रिय और कर्मफलदाता भगवान शनिदेव की प्रभावशाली स्तुति, जिससे शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या एवं महादशा के कष्ट शांत होते हैं।

साढ़ेसाती व ढैया के दुष्प्रभावों में राहत, कानूनी विवादों में सफलता, दुर्घटनाओं से रक्षा और धैर्य में वृद्धि।
5 दोहे
40 चौपाइयाँ
दोहा प्रारंभिक दोहा 1

शनि चालीसा शनि चालीसा ॥दोहा॥

दोहा प्रारंभिक दोहा 2

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल। दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥

चौपाई चौपाई 1

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज। करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

चौपाई चौपाई 2

जयति जयति शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥

चौपाई चौपाई 3

चारि भुजा, तनु श्याम विराजै। माथे रतन मुकुट छबि छाजै॥

चौपाई चौपाई 4

परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥

चौपाई चौपाई 5

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिय माल मुक्तन मणि दमके ॥१॥

चौपाई चौपाई 6

कर में गदा त्रिशूल कुठारा। पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥

चौपाई चौपाई 7

पिंगल, कृष्ो, छाया नन्दन। यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन॥

चौपाई चौपाई 8

सौरी, मन्द, शनी, दश नामा। भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥

चौपाई चौपाई 9

जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं। रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं ॥२॥

चौपाई चौपाई 10

पर्वतहू तृण होई निहारत। तृणहू को पर्वत करि डारत॥

चौपाई चौपाई 11

राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो। कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो॥

चौपाई चौपाई 12

बनहूँ में मृग कपट दिखाई। मातु जानकी गई चुराई॥

चौपाई चौपाई 13

लखनहिं शक्ति विकल करिडारा। मचिगा दल में हाहाकारा ॥३॥

चौपाई चौपाई 14

रावण की गतिमति बौराई। रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥

चौपाई चौपाई 15

दियो कीट करि कंचन लंका। बजि बजरंग बीर की डंका॥

चौपाई चौपाई 16

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा। चित्र मयूर निगलि गै हारा॥

चौपाई चौपाई 17

हार नौलखा लाग्यो चोरी। हाथ पैर डरवाय तोरी ॥४॥

चौपाई चौपाई 18

भारी दशा निकृष्ट दिखायो। तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥

चौपाई चौपाई 19

विनय राग दीपक महं कीन्हयों। तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों॥

चौपाई चौपाई 20

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी। आपहुं भरे डोम घर पानी॥

चौपाई चौपाई 21

तैसे नल पर दशा सिरानी। भूंजीमीन कूद गई पानी ॥५॥

चौपाई चौपाई 22

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई। पारवती को सती कराई॥

चौपाई चौपाई 23

तनिक विलोकत ही करि रीसा। नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥

चौपाई चौपाई 24

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी। बची द्रौपदी होति उघारी॥

चौपाई चौपाई 25

कौरव के भी गति मति मारयो। युद्ध महाभारत करि डारयो ॥६॥

चौपाई चौपाई 26

रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला। लेकर कूदि परयो पाताला॥

चौपाई चौपाई 27

शेष देवलखि विनती लाई। रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥

चौपाई चौपाई 28

वाहन प्रभु के सात सजाना। जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥

चौपाई चौपाई 29

जम्बुक सिंह आदि नख धारी।सो फल ज्योतिष कहत पुकारी ॥७॥

चौपाई चौपाई 30

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं। हय ते सुख सम्पति उपजावैं॥

चौपाई चौपाई 31

गर्दभ हानि करै बहु काजा। सिंह सिद्धकर राज समाजा॥

चौपाई चौपाई 32

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै। मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥

चौपाई चौपाई 33

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी। चोरी आदि होय डर भारी ॥८॥

चौपाई चौपाई 34

तैसहि चारि चरण यह नामा। स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥

चौपाई चौपाई 35

लौह चरण पर जब प्रभु आवैं। धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥

चौपाई चौपाई 36

समता ताम्र रजत शुभकारी। स्वर्ण सर्व सर्व सुख मंगल भारी॥

चौपाई चौपाई 37

जो यह शनि चरित्र नित गावै। कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ॥९॥

चौपाई चौपाई 38

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला। करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥

चौपाई चौपाई 39

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई। विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥

चौपाई चौपाई 40

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत। दीप दान दै बहु सुख पावत॥

दोहा समापन दोहा 1

कहत राम सुन्दर प्रभु दासा। शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ॥१०॥

दोहा समापन दोहा 2

॥दोहा॥

दोहा समापन दोहा 3

पाठ शनिश्चर देव को, की हों भक्त तैयार। करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥