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माँ लक्ष्मी (महालक्ष्मी)

श्री लक्ष्मी चालीसा

Shree Lakshmi Chalisa • रचयिता: परम्परागत

धन, वैभव, ऐश्वर्य एवं सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी की मंगलमयी स्तुति, जिससे दरिद्रता दूर होती है और घर में सुख-समृद्धि वास करती है।

आर्थिक तंगी व ऋण से मुक्ति, स्थिर धन-वैभव, व्यापारिक लाभ और पारिवारिक शांति की प्राप्ति होती है।
9 दोहे
40 चौपाइयाँ
दोहा प्रारंभिक दोहा 1

लक्ष्मी चालीसा लक्ष्मी चालीसा ॥ दोहा ॥

दोहा प्रारंभिक दोहा 2

मातु लक्ष्मी करि कृपा करो हृदय में वास। मनोकामना सिद्ध कर पुरवहु मेरी आस॥

चौपाई चौपाई 1

सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार। ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे नत शिर बारंबार॥ टेक॥

चौपाई चौपाई 2

|| सोरठा ||

चौपाई चौपाई 3

यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूं। सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥

चौपाई चौपाई 4

॥ चौपाई ॥

चौपाई चौपाई 5

सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि॥

चौपाई चौपाई 6

तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरबहु आस हमारी॥

चौपाई चौपाई 7

जै जै जगत जननि जगदम्बा। सबके तुमही हो स्वलम्बा॥

चौपाई चौपाई 8

तुम ही हो घट घट के वासी। विनती यही हमारी खासी॥

चौपाई चौपाई 9

जग जननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥

चौपाई चौपाई 10

विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी।

चौपाई चौपाई 11

केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥

चौपाई चौपाई 12

कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी। जगत जननि विनती सुन मोरी॥

चौपाई चौपाई 13

ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥

चौपाई चौपाई 14

क्षीर सिंधु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिंधु में पायो॥

चौपाई चौपाई 15

चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभुहिं बनि दासी॥

चौपाई चौपाई 16

जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥

चौपाई चौपाई 17

स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥

चौपाई चौपाई 18

तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥

चौपाई चौपाई 19

अपनायो तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥

चौपाई चौपाई 20

तुम सब प्रबल शक्ति नहिं आनी। कहं तक महिमा कहौं बखानी॥

चौपाई चौपाई 21

मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन- इच्छित वांछित फल पाई॥

चौपाई चौपाई 22

तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मन लाई॥

चौपाई चौपाई 23

और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करे मन लाई॥

चौपाई चौपाई 24

ताको कोई कष्ट न होई। मन इच्छित फल पावै फल सोई॥

चौपाई चौपाई 25

त्राहि- त्राहि जय दुःख निवारिणी। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि॥

चौपाई चौपाई 26

जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे। इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥

चौपाई चौपाई 27

ताको कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै।

चौपाई चौपाई 28

पुत्र हीन और सम्पत्ति हीना। अन्धा बधिर कोढ़ी अति दीना॥

चौपाई चौपाई 29

विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥

चौपाई चौपाई 30

पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥

चौपाई चौपाई 31

सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥

चौपाई चौपाई 32

बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥

चौपाई चौपाई 33

प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं। उन सम कोई जग में नाहिं॥

चौपाई चौपाई 34

बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥

चौपाई चौपाई 35

करि विश्वास करैं व्रत नेमा। होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥

चौपाई चौपाई 36

जय जय जय लक्ष्मी महारानी। सब में व्यापित जो गुण खानी॥

चौपाई चौपाई 37

तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयाल कहूं नाहीं॥

चौपाई चौपाई 38

मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजे॥

चौपाई चौपाई 39

भूल चूक करी क्षमा हमारी। दर्शन दीजै दशा निहारी॥

चौपाई चौपाई 40

बिन दरशन व्याकुल अधिकारी। तुमहिं अक्षत दुःख सहते भारी॥

दोहा समापन दोहा 1

नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥

दोहा समापन दोहा 2

रूप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥

दोहा समापन दोहा 3

कहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिकाई॥

दोहा समापन दोहा 4

रामदास अब कहाई पुकारी। करो दूर तुम विपति हमारी॥

दोहा समापन दोहा 5

॥ दोहा ॥

दोहा समापन दोहा 6

त्राहि त्राहि दुःख हारिणी हरो बेगि सब त्रास। जयति जयति जय लक्ष्मी करो शत्रुन का नाश॥

दोहा समापन दोहा 7

रामदास धरि ध्यान नित विनय करत कर जोर। मातु लक्ष्मी दास पर करहु दया की कोर॥